अलबेले अर्थशास्त्री डॉ. आंबेडकर
डॉ. आंबेडकर के मुताबिक, “मुग़ल बादशाहों ने कभी भी अपने सिक्कों की गुणवत्ता कम नहीं की। सिक्का ढालने की तकनीक में कमियों को ध्यान में रखते हुए भी, उनके साम्राज्य के सबसे दूर-दराज़ इलाकों में स्थित टकसालों से जारी सिक्के भी मानक से बहुत ज़्यादा अलग नहीं होते थे।”, पढ़ें, कंवल भारती द्वारा डॉ. आंबेडकर की कृति ‘द प्रॉब्लम ऑफ़ द रूपी’ के पहले अध्याय का पुनर्पाठ
– यानी 1800 से 1893 तक का समय। दूसरे लेखकों ने न सिर्फ़ विनिमय मानक की कहानी अचानक शुरू कर दी है, बल्कि उन्होंने इस बात को भी आम बना दिया है कि विनिमय मानक ही वह मानक था, जिसे शुरू में भारत सरकार ने सोचा था। मुझे लगता है कि यह एक बड़ी गलती है। असल में, भारतीय मुद्रा के बारे में सबसे दिलचस्प बात यह है कि किस तरह स्वर्ण मानक बदलकर स्वर्ण विनिमय मानक बन गया। इसलिए, इस गलती को उजागर करने के लिए कुछ पुरानी, लेकिन अब भुला दी गई बातों को फिर से बताना ज़रूरी था।”
अलग-अलग रियासतों में ही मान्य थीं, जिनमें साम्राज्य बंट गया था। ऐसे हालात में, सामान के बदले भुगतान के तौर पर मिले सिक्कों से ज़रूरी धातु-मूल्य हासिल करके लेन-देन पूरा नहीं किया जा सकता था। व्यापारियों को यह पक्का करना होता था कि सिक्के उनके अपने इलाके में भी कानूनी तौर पर मान्य हों।
1793 के बंगाल मुद्रा क़ानून (रेगुलेशन)-35 की प्रस्तावना इस बात पर अच्छी रोशनी डालती है। इसमें कहा गया है– ‘बंगाल, बिहार और उड़ीसा के मुख्य ज़िलों में से हर एक की अपनी अलग चांदी की मुद्रा है, जो उन ज़िलों में सभी लेन-देन के लिए मूल्य का मानक पैमाना है, जहां वे चलती हैं।’”
इस तरह, आंबेडकर के अनुसार, “अलग-अलग तरह के पुराने रुपए जल्द ही कुछ खास इलाकों में प्रचलित मुद्रा बन गए। इसका नतीजा यह हुआ कि हर रुपए की कीमत उस इलाके में बढ़ गई, जहां वह चलता था, क्योंकि सभी लेन-देन के लिए उसकी मांग थी। एक और नतीजा यह हुआ कि एक इलाके में लाए गए
किसी भी दूसरी तरह के रुपए को लेने से मना कर दिया जाता था, क्योंकि वह उस मूल्य-मापक से अलग होता था, जिससे वहां के लोग अपनी संपत्ति का मूल्य आंकने के आदी हो चुके थे। या फिर, अगर उसे स्वीकार भी किया जाता, तो उस पर उतनी ही कटौती की जाती, जितनी कटौती लेने वाले को किसी सर्राफ़ के यहां उस रुपए को इलाके में प्रचलित रुपए से बदलने पर देनी पड़ती, या किसी दूसरे व्यक्ति को भुगतान करते समय उस पर देनी पड़ती।
“जब एक ज़िले में चलने वाले सिक्के को दूसरे ज़िले में भुगतान के तौर पर दिया जाता है और उसे स्वीकार नहीं किया जाता, तो देश के अलग-अलग हिस्सों के व्यापारियों और ज़मीन के मालिकों व किसानों को एक-दूसरे के साथ व्यापारिक लेन-देन में विनिमय से जुड़े नुकसान और अन्य सभी तरह की परेशानियां उठानी पड़ती हैं। ये वही नुकसान और परेशानियां हैं,
जो तब होतीं, जब अलग-अलग ज़िले अलग-अलग और स्वतंत्र सरकारों के अधीन होते और हर सरकार का अपना अलग सिक्का होता।”टकसाल कानून में संशोधन करने की बात आई, तो वे इसी बात से संतुष्ट रहे – मानो कुछ हुआ ही न हो या कुछ होने की संभावना ही न हो – कि 1835 का चांदी का मानक बिना किसी सोने की मिलावट के, शुद्ध रूप में चलता रहे।
